Sunday, 13 July 2025

by सीमा मेहरोत्रा

बर्फ की सिलवटो मे , लिपटी हुई ये रात
मुझे अजनबी निगाहों से देखती है
दूधिया चांदनी मे नहाये ये दरख्त
मुझसे मेरे पता पूछते है

पेड़ की शाखों से दबे पाव उतर कर
एक ख़ामोश उदासी
पसर जाती है कमरे मे
आईने मे मेरे ही अक्स मुझे
अनचिहा सा लगता है

सर्द रात, तन्हाई का आलम
और बस कुछ अधूरी खुवाहिशों
की परछाईया

by सीमा मेहरोत्रा 

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