बर्फ की सिलवटो मे , लिपटी हुई ये रात
मुझे अजनबी निगाहों से देखती है
दूधिया चांदनी मे नहाये ये दरख्त
मुझसे मेरे पता पूछते है
पेड़ की शाखों से दबे पाव उतर कर
एक ख़ामोश उदासी
पसर जाती है कमरे मे
आईने मे मेरे ही अक्स मुझे
अनचिहा सा लगता है
सर्द रात, तन्हाई का आलम
और बस कुछ अधूरी खुवाहिशों
की परछाईया
by सीमा मेहरोत्रा
मुझे अजनबी निगाहों से देखती है
दूधिया चांदनी मे नहाये ये दरख्त
मुझसे मेरे पता पूछते है
पेड़ की शाखों से दबे पाव उतर कर
एक ख़ामोश उदासी
पसर जाती है कमरे मे
आईने मे मेरे ही अक्स मुझे
अनचिहा सा लगता है
सर्द रात, तन्हाई का आलम
और बस कुछ अधूरी खुवाहिशों
की परछाईया
by सीमा मेहरोत्रा
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